उत्तरकाशी

माया से भंग हो चुका ब्राह्मणों का मोह, सदमे में होंगे सतीश

अवनींद्र कमल
राजनीतिक विश्लेषक

बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया है और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले उनके इस आकस्मिक फैसले से पार्टी के झंडाबरदार बहुत मायूस हुए हैं। माना जा रहा है कि अर्श से फर्श पर आ चुकी बहुजन समाज पार्टी के लिए खोने को अब कुछ और नहीं बचा है। पार्टी में कांशीराम के समय के दिग्गज नेता एक-एक करके निकल गए या फिर निकाल दिए गए। दलित और पिछड़े नेता ही नहीं, ब्राह्मण समज के जनाधार वाले नेताओं ने भी हाथी की सवारी छोड़ दी है।

इस हाल में 2007 में सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को रसातल में जाता हुआ देखा जा सकता है। मायावती की जिद और अहंकार ने पार्टी की लुटिया ही एक तरह से डुबो दी है। बसपा का यह पराभव सपा कांग्रेस गठबंधन के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। पीडीए पर मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री और सपा मुखिया अखिलेश यादव के लिए सुनहरा अवसर है कि वह बागपत से लेकर बलिया तक ब्राह्मणों को अपने पाले में कर सकें। हालांकि कांग्रेस भी ब्राह्मणों को लेकर बड़ा दांव चल रही है।

यहां यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि सन 2007 में बसपा की सरकार बनाने में ब्राह्मण समाज का बहुत बड़ा योगदान रहा था। मायावती ने ब्राह्मण समाज के नेताओं को अपने मंत्रिमंडल में बड़ा स्थान भी दिया था। लेकिन अब? अब पार्टी में सतीश चंद्र मिश्रा को छोड़कर कोई बड़ा ब्राह्मण नेता नहीं बचा है। ब्राह्मण नेता के तौर पर सतीश चंद्र मिश्रा अकेले पड़ गए हैं। यहां उल्लेखनीय है कि बहुजन समाज पार्टी सरकार के कार्यकाल के दौरान जिन ब्राह्मण नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिली थी, अब उन सभी ने पार्टी से नाता तोड़कर अपने लिए नया स्थान खोज लिया है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक भाजपा में स्थापित नेता हैं। पाठक कभी बसपा के झंडाबरदार थे। इसी तरह नकुल दुबे , राकेश पांडेय, रितेश पांडेय माया की पार्टी से नाता तोड़ चुके हैं। बसपा सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे रामवीर उपाध्याय का निधन हो चुका है। उनकी पत्नी और भाई मुकुल उपाध्याय भी अलग हो चुके हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली और माफिया डॉन श्री भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित को भी बसपा से निकाला जा चुका है। हाल ही में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने जिन अनंत मिश्रा को पार्टी से बाहर निकाला है, वे बसपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे। मायावती के पहले ओएसडी और उनके खास सिपहसालार पंडित ओमप्रकाश त्रिपाठी भी बसपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हैं।

त्रिपाठी को मायावती ने एमएलसी बनाया था और उनके बेटे को दर्जा प्राप्त मंत्री। वह बहन जी के किचन कैबिनेट के नेता कहे जाते थे और बड़े-बड़े मंत्री उनके दर पर दरबार लगाते थे। इन नेताओं के अलावा दद्दन मिश्रा, राजेश त्रिपाठी, शिव प्रताप मिश्रा, रामू द्विवेदी जैसे तमाम ब्राह्मण नेता भी बसपा से दूर हो चुके हैं। अरविंद त्रिपाठी उर्फ गुड्डू त्रिपाठी भी अब भाजपा में हैं। बाहुबली स्वर्गीय हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी अब बसपा में नहीं है। इस हाल में केवल सतीश चंद्र मिश्र की बदौलत मायावती को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। दिलचस्प यह है कि सन 1984 में कांशीराम ने जिस बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी, उस दौर के पिछड़े और दलित समाज के नेता भी मायावती की सामंती ठसक के नाते अलग हो गए। जंग बहादुर पटेल, आरके चौधरी, रामअचल राजभर, लालजी वर्मा, धर्म सिंह सैनी, स्वामी प्रसाद मौर्य, दीनानाथ भास्कर, अशोक कुमार, रविंद्र मोलहू, जगपाल दास, बाबू सिंह कुशवाहा, राजबहादुर, डाक्टर मसूद अहमद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और जयप्रकाश सिंह, रणधीर सिंह समेत दर्जनों नाम गिनाये जा सकते हैं। बसपा का इससे बुरा दिन और क्या होगा। उसका सांगठनिक ढांचा भी चरमरा चुका है। इस हाल में आकाश आनंद की छुट्टी ने बसपा से जुड़े सहोदर सगठनों को हताश कर दिया है।

समझा जाता है कि अगर यही हाल रहा तो भावी विधानसभा चुनाव में बसपा का हाथी दलदल में ही रहेगा। अब रही बात आकाश आनंद की, तो उनकी सियासी समझ पर संदेश नहीं किया जा सकता। वह एक अच्छे वक्ता ही नहीं आक्रामक लीडर हैं। मायावती से अलग होकर अगर वह अपनी कोई पार्टी खड़ी करते हैं, तो अवश्य ही उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज का एक नया सूर्योदय दिखाई देगा। कुछ भी हो लेकिन आकाश आनंद को पार्टी से दूध में मक्खी की तरह निकाल देने के बाद मायावती ने कार्यकर्ताओं को नया लक्ष्य सौंपा है।

उन्होंने बसपा कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वो विरोधियों के सभी राजनीतिक हथकंडों का मजबूती से मुकाबला करें। उन्होंने उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों में ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत पर चलते हुए पूरी ताकत से जुटने और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की बात की है। लेकिन मायावती को भी यह समझना चाहिए कि बंदूकों से प्रेत नहीं मारे जाते। किसी भी दल की ताकत संगठन में होती है। आपने तो संगठन ही तहस-नहस कर दिया। अंत में बसपा के लिए यही कहना होगा….

वक्त इससे खराब क्या होगा,

अब कोई इंकलाब क्या होगा।।

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