उन्नति, उत्कर्ष और उत्थान की उड़ान भरता उत्तराखंड, धाकड़-धुरंधर धामी की धाक और धमक बरकरार

अवनींद्र कमल
राजनीतिक विश्लेषक
यह कम दिलचस्प नहीं है कि उत्तराखंड को राज्य का अलग दर्जा मिलने के बाद पुष्कर सिंह धामी दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने निर्विवाद रूप से 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। इसके पहले कांग्रेस के पंडित नारायण दत्त तिवारी 5 साल का कार्यकाल पूरा किए थे। तिवारी अविभाजित उत्तर प्रदेश के भी कई बार मुख्यमंत्री रह चुके थे। सियासत के बीहड़ अनुभवों के धनी नारायण दत्त तिवारी ने उत्तराखंड के उत्तरोत्तर विकास में कोई कमी नहीं छोड़ी। उनके बाद भाजपा और कांग्रेस की सरकारें आती- जाती रहीं। लेकिन स्थिरता कभी नहीं रही। भाजपा के भुवन चंद्र खंडूरी रहे हों, डॉ रमेश शंकर पोखरियाल निशंक, त्रिवेंद्र सिंह रावत या फिर तीरथ सिंह रावत ही क्यों न रहे हों, सभी को सत्ता के रथ से, विरथ होना पड़ा। लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड को उत्कर्ष, उन्नति और उत्थान की ऊंचाइयों तक ले जाने में कसर नहीं छोड़ी। नतीजा है कि उन्हें धाकड़, धुरंधर और धैर्यवान धामी कहा जाने लगा है। एक युवा मुख्यमंत्री के रूप में जवान हो चुके उत्तराखंड को धामी ने काफी ताकतवर बना दिया। विरोधी इसीलिए ताकते रह गए। उनके राजनीतिक कौशल पर केंद्र ने भी मोहर लगा दी। अपने दूसरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ऐतिहासिक व सशक्त फैसले लिए हैं। इससे राष्ट्रीय स्तर पर भी राज्य को पहचान मिली है। इसके अलावा पुष्कर सिंह धमी ने अवस्थापना विकास से राज्य को नई दिशा दी है। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करना धामी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि है। इसको लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना है। एक बात और।
उत्तराखंड में सशक्त भू-कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, दंगारोधी कानून, नकलरोधी कानून के अलावा मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का फैसला कोई मामूली बात नहीं। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कार्रवाई धामी की उपलब्धियों में शुमार है। बीते पांच वर्षों में 30 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियां मिलीं। शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव करते हुए मदरसा बोर्ड को समाप्त कर राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया। अब यही प्राधिकरण पाठ्यक्रम और शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित कर रहा है। राज्य में 12 हजार एकड़ से अधिक सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है।
गौर करें तो प्रशासनिक सुधार, भर्ती प्रणाली, निवेश, आधारभूत ढांचे, धार्मिक पर्यटन, आपदा प्रबंधन और डिजिटल शासन जैसे क्षेत्रों में आमूल-चूल बदलाव किया गया है। धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने भर्ती प्रक्रिया, आधारभूत ढांचे, धार्मिक पर्यटन, आपदा प्रबंधन और डिजिटल शासन जैसे कई क्षेत्रों में विभिन्न पहलें की। रोजगार, पलायन, पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे। राज्य की सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक स्थिरता रही है। इसे बनाए रखने में वह सफल रहे। अपने कार्यकाल के दौरान निर्णय प्रक्रिया को तेज करने, विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने और समयबद्ध कार्य संस्कृति विकसित करने में धामीक कोई सानी नहीं।
आपदा प्रबंधन की नई सोच
उत्तराखंड भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील राज्य है। हर वर्ष भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएं चुनौती बनती हैं। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने जोखिम कम करने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सड़क संपर्क बहाल करने और राहत कार्यों में तकनीक के उपयोग पर अधिक जोर दिया। चारधाम यात्रा के दौरान मौसम संबंधी निगरानी, नियंत्रण कक्षों की सक्रियता और जिला प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
धार्मिक पर्यटन और आधारभूत ढांचा
धामी सरकार ने धार्मिक पर्यटन को राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार मानते हुए कई परियोजनाओं को गति देने का प्रयास किया। चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं में सुधार, सड़क संपर्क, पार्किंग, यात्री सुविधाओं और रोपवे परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ाया। इसके साथ ही सड़क, पुल, स्वास्थ्य संस्थानों और शहरी विकास से जुड़ी परियोजनाओं पर भी निवेश बढ़ाया गया। राज्य सरकार ने निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से निवेशक सम्मेलन आयोजित किए और औद्योगिक निवेश के लिए नई नीतियां लागू करने की दिशा में काम किया। विभिन्न क्षेत्रों में निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जिनसे भविष्य में रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है।
महिलाओं के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण, स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा, स्वरोजगार योजनाओं और ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने की दिशा में विभिन्न कार्यक्रम संचालित किए गए। मुख्यमंत्री ने सुरक्षा और आर्थिक भागीदारी बढ़ाने को भी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल।
सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने, शिकायत निवारण व्यवस्था को डिजिटल बनाने, दस्तावेजों की ऑनलाइन उपलब्धता और विभागों के बीच डेटा साझा करने की दिशा में कई पहलें की गईं. इससे प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाने का प्रयास किया गया।
इन सब के बावजूद विपक्षी कांग्रेस ने बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा, सड़क सुरक्षा और कुछ विकास परियोजनाओं की गति को लेकर सवाल उठाए। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री इसका डटकर सामना कर रहे हैं।
आगे की दिशा दशा और सोच
राज्य सरकार ने वर्ष 2035 तक उत्तराखंड को विकास के नए स्तर पर ले जाने का लक्ष्य व्यक्त किया है। पर्यटन, कृषि, उद्योग, डिजिटल सेवाओं और आधारभूत ढांचे के विस्तार पर लगातार काम किया जा रहा है। साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना, स्थानीय रोजगार बढ़ाना और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाएं उपलब्ध कराना भविष्य की प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। अब आने वाले चुनाव के संदर्भ में देखें तो पुष्कर सिंह धामी विपक्ष की बांह मरोड़ने को तैयार हैं। सियासी संग्राम के लिए उनकी फौज बख्तरबंद हो चुकी है। इस फौज में युवा, महिलाएं, सेवानिवृत्त सैनिक से लेकर भाजपा के सहोदर संगठन मोर्चा संभालने को तैयार खड़े हैं, तैयार बैठे नहीं हैं। कांग्रेस और भाजपा में यही फर्क है। भाजपा पूरी तरह चुनावी मोड में है। और कांग्रेस, वह मोड में नहीं मोड़ पर है। वह भी खतरनाक मोड़ पर। उसके आगे कुआं तो पीछे खाई है।




