कांग्रेस के मोहरो के लिए भाजपा में नए चेहरों की तलाश

अवनींद्र कमल
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले उत्तराखंड की राजनीति में बड़ी उथल-पुथल के संकेत मिल रहे हैं। दरअसल, आंतरिक सर्वे में भारतीय जनता पार्टी के एक दर्जन से ज्यादा विधायकों के लिए खतरे की घंटी है। अगर उनका टिकट कटता है तो वह कांग्रेस का रुख करेंगे या फिर निर्दलीय ताल ठोक सकते हैं। चुनाव से पहले भाजपा में भगदड़ न हो, लिहाजा पार्टी की ओर से अभी तक यही बयान जारी किया जा रहा है कि सिटिंग विधायकों का टिकट न के बराबर ही कटेगा। लेकिन सच्चाई यह बिल्कुल नहीं है। एक तो सत्ता विरोधी लहर और दूसरे कई विधायकों का जनता जनार्दन से दूरी बनाए रखना, भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है। मीडिया में यह अफवाहें जानबूझकर उड़वाई गई हैं कि भाजपा नए चेहरों का प्रयोग नहीं करने जा रही है। उधर, पहाड़ बनाम तराई में संतुलन बिठाना भी भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बेहद कठिन माना जा रहा है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि उत्तराखंड में दलबदल ने चुनावी समीकरणों को काफी बदल दिया है। कांग्रेस के कई पुराने और चुनाव लड़ चुके चेहरे भाजपा में जा चुके, वहीं भाजपा के पूर्व विधायकों और स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया है। इस उम्मीद से कि उनका सियासी मुस्तकबिल सुनहरा होगा। भारतीय जनता पार्टी की हाल ही में कोर कमेटी की बैठक दिल्ली में हुई। इस बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि संगठन और संभावित उम्मीदवारों को लेकर अपनी जमीन मजबूत रखी जाए। दल बदल को लेकर कांग्रेस ही नहीं बीजेपी भी अलर्ट हो चुकी है। इसमें दो राय नहीं कि प्रत्याशी बदलने से समीकरण भी बदलते रहते हैं। कांग्रेस को ही देख लीजिए। उत्तरकाशी जिले में 2022 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर पुरोला से मालचंद, यमुनोत्री से दीपक बिजल्वाण और गंगोत्री से विजयपाल सिंह सजवाण चुनाव मैदान में थे। अब ये तीनों नेता भाजपा के साथ हैं। इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस इन तीनों सीटों पर चुनाव से बाहर हो गई है, लेकिन पार्टी को स्थानीय स्तर पर नए चेहरे तलाशने और दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे बढ़ाने की चुनौती जरूर है।
पहाड़ी विधानसभा सीटों पर ऐसी रवायत रही है कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, गांव-गांव का संपर्क और स्थानीय संगठन चुनाव में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इनमें अगर संतुलन बिगड़ा तो पार्टी के लिए नुकसानदायक होता रहा है । भाजपा हो या फिर कांग्रेस, उसके लिए सिर्फ नया प्रत्याशी घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा, उसे उसके पीछे पूरा संगठन भी खड़ा करना पड़ेगा। संगठन की शक्ति के बिना सत्ता संग्राम में विजय हासिल करना नामुमकिन होता है। इसमें दो राय नहीं कि चुनाव से पहले नेताओं में दल बदलने का चलन रहा है। इस बार भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
भाजपा जिन विधायकों का टिकट काटना चाहती है, उनके नाम की घोषणा अगर अभी कर दे तो भगदड़ शुरू हो जाएगी। उधर मुख्य विपक्षी कांग्रेस पिछले चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई है, लिहाजा उसके सामने पहाड़ जैसी चुनौती है। वैसे भी देखें तो कांग्रेस के कई दिग्गज सत्ता की मलाई मारने के लिए भाजपा में जा चुके हैं। कह सकते हैं कि पूर्व में दलबदल के बाद गढ़वाल से लेकर कुमाऊं और मैदानी क्षेत्रों तक कई सीटों पर कांग्रेस की पुरानी चुनावी तस्वीर बदल गई है। टिहरी में धन सिंह नेगी, धनौल्टी में जोत सिंह बिष्ट, पौड़ी में नवल किशोर, लैंसडाउन में अनुकृति गुसाईं रावत, चौबट्टाखाल में केसर सिंह नेगी, यमकेश्वर में शैलेंद्र रावत और बदरीनाथ में राजेंद्र भंडारी जैसे नाम अब कांग्रेस के साथ नहीं हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि मैदानी और कुमाऊं क्षेत्र में खानपुर, रुड़की, कालाढूंगी, रुद्रपुर, भीमताल, बागेश्वर और धर्मपुर जैसी सीटों पर भी पुराने समीकरण बदले हैं। डोईवाला में वरिष्ठ नेता हीरा सिंह बिष्ट के निधन के बाद पार्टी के सामने अलग तरह के नेतृत्व की चुनौती खड़ी हुई है।
हालांकि इन सभी सीटों को कांग्रेस की कमजोर सीट कदापि नहीं कह सकते। कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा काम यही है कि वह इन सीटों पर ऐसे स्थानीय चेहरे तलाशे जिनकी स्वीकार्यता सिर्फ पार्टी संगठन तक सीमित न हो, बल्कि जनता के बीच भी हो। यह नहीं भूलना चाहिए कि पार्टी बदलने से सारे के सारे वोट ट्रांसफर हो जाते हैं। बद्रीनाथ सीट इस बात का उदाहरण है। यहां पर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए राजेंद्र भंडारी को भाजपा ने 2024 के उपचुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया, लेकिन कांग्रेस के लखपत बुटोला ने उन्हें हरा दिया। इससे एक राजनीतिक संकेत साफ मिला कि किसी बड़े नेता का पार्टी बदलना अपने साथ पूरा वोट बैंक ले जाने की गारंटी नहीं है।
यही बात 2027 में भी दोनों दलों पर लागू होगी। कांग्रेस से भाजपा में गए नेताओं के सामने यह साबित करने की चुनौती होगी कि उनका व्यक्तिगत प्रभाव पार्टी बदलने के बाद भी कायम है। दूसरी तरफ भाजपा से कांग्रेस में आए नेताओं को भी यही परीक्षा देनी होगी। दलबदल के बाद असली ताकत का फैसला चुनाव मैदान में वोट से होगा। इस संदर्भ में अगर कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस ने भी 2027 से पहले भाजपा के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ा है।
मार्च 2026 में भाजपा के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल और भीमलाल आर्य समेत छह नेता कांग्रेस में शामिल हुए। ठुकराल रुद्रपुर से दो बार विधायक रह चुके हैं। जबकि नारायण पाल और भीमलाल आर्य का भी अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक आधार और प्रभाव रहा है। इन नेताओं के कांग्रेस में आने से खास तौर पर तराई और मैदानी सीटों पर नए समीकरण बने हैं। रुद्रपुर में राजकुमार ठुकराल की एंट्री को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। वह भाजपा के पुराने चेहरे रहे हैं और अब कांग्रेस के साथ हैं।
ऐसे में कांग्रेस पहाड़ में नए चेहरों की तलाश के साथ-साथ तराई में बीहड़ अनुभवों के धनी दिग्गज नेताओं को साथ लेकर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड की राजनीति को नजदीक से जानने और परखने वाले डॉक्टर दिनेश प्रताप सिंह का कहना है कि 2027 के चुनाव में तराई बनाम पहाड़ का राजनीतिक एंगल भी अहम हो सकता है। बकौल, डॉक्टर दिनेश उत्तराखंड की पहाड़ी सीटों पर पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और आपदा जैसे मुद्दे प्रमुख रहते हैं, जबकि तराई और मैदानी क्षेत्रों में उद्योग, कृषि, जमीन, रोजगार, शहरी विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों का असर अधिक दिखाई देता है। इस कसौटी पर भारतीय जनता पार्टी के लिए 27 के चुनाव में कम कठिनाइयां नहीं हैं। कांग्रेस के सामने पहाड़ में पुराने चेहरों के जाने के बाद नई लीडरशिप तैयार करने की चुनौती है। जबकि तराई में राजकुमार ठुकराल जैसे अनुभवी नेताओं की मौजूदगी से वह भाजपा के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देने की स्थिति में आती जा रही है।
कांग्रेस के नेताओं का भाजपा में जाना फिलहाल कांग्रेस के लिए नुकसान है, लेकिन भाजपा के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं । मसलन, जिन सीटों पर कांग्रेस से आए नेता भाजपा में पहुंचे हैं, वहां पहले से भाजपा के पुराने दावेदार मौजूद हैं। ये वह दावेदार हैं जो कई सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं।
टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस से आए नेता को टिकट मिलता है, तो भाजपा में भी बागियों का एक धड़ा तैयार हो सकता है। इस हालात को भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व पूरी तरह समझ रहा है। आंतरिक सर्वे रिपोर्ट तो काम करेगी ही, साथ ही 2027 के चुनाव में भाजपा जिताने की क्षमता के आधार पर नए चेहरे को प्राथमिकता देगी। अभी से पार्टी में कोई असंतोष न फैले लिहाजा अभी नाम घोषित नहीं किये जा रहे हैं। लेकिन अंदरखाने खदबदाहट बढ़ गई है। कुछ बुजुर्ग नेता जो विधायक और मंत्री भी हैं, उन पर तलवार लटक रही है। वहीं कांग्रेस के सामने उत्तराखंड में
संगठन खड़ा करने की चुनौती है।
कांग्रेस के लिए सिर्फ बड़े नेताओं की वापसी या नए नेताओं का शामिल होना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी को इन नेताओं को बूथ स्तर के संगठन से जोड़ना होगा। खास तौर पर जिन पहाड़ी सीटों पर पुराने चुनावी चेहरे चले गए हैं, वहां समय रहते दूसरी पंक्ति तैयार करनी होगी। नहीं तो सारा किया-धरा, धरा रह जाएगा। कुल मिलाकर सन 27 के चुनाव में भाजपा के सामने किला बचाने की तो कांग्रेस के सामने किला भेदने की चुनौती होगी।
लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।




