यूपी में ब्राह्मणों का कोप भाजन बन सकती है भाजपा
ब्राह्मणों के मसले पर कभी मुखर नहीं हुए उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक

अवनींद्र कमल
(राजनीतिक विश्लेषक)
देहरादून: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार से फिलहाल ब्राह्मण समाज की नाराजगी बढ़ती जा रही है। सन 17 से लेकर अब तक ब्राह्मणों पर हुए अत्याचार, बड़ी आपराधिक घटनाएं, राजनीतिक हिस्सेदारी में ब्राह्मणों की उपेक्षा ने उन्हें झकझोर कर रख दिया है। समय-समय पर बड़े विवाद खड़े हुए हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में विपक्ष ने इसे एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना लिया है। यह और बात है कि भाजपा ने इसे सिरे से खारिज किया है। लेकिन सन 27 के चुनाव को सामने रखकर देखें तो इस बार उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण समाज सपा की साइकिल की ओर रुख करता नजर आ रहा है। बेशक, भारतीय जनता पार्टी ब्राह्मणों को लेकर कड़ी मशक्कत कर रही है लेकिन ब्राह्मण समाज खुद इसका लेखा-जोखा कर रहा है। जानकारों का कहना है कि भावी विधानसभा चुनाव में भाजपा के ब्राह्मण विधायकों को अगर दोबारा टिकट मिलता है तो क्षेत्र में उनको घनघोर विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों पर अत्याचार की कई ऐसी घटनाएं हुई, जिन पर सरकार में शामिल ब्राह्मण नेता मुंह में दही जमा कर बैठे रहे। और तो और उप मुख्यमंत्री बनाए गए बृजेश पाठक ब्राह्मणों को लेकर कभी मुखर नहीं रहे। हां, इतना जरूर है कि पाठक कभी-कभार ब्राह्मणों के पक्ष में रस्म अदायगी करते नजर आए। वैसे भी ब्राह्मण समाज बृजेश पाठक को अपना नेता नहीं मानता। उपमुख्यमंत्री होने के बाद भी बृजेश पाठक की हैसियत भाजपा सरकार में मामूली सी है। उनको बसपा के गोत्र का माना जाता है। बाकी और विधायक तथा मंत्री पूरे कार्यकाल हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। ब्राह्मणों की नाखुशी का यही बहुत बड़ा कारण है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों पर हुई कथित आपराधिक घटनाओं और उनके इर्द-गिर्द बुनी गई राजनीतिक कहानी (Story) के मुख्य पहलू पर ध्यान दें तो पता चलता है कि ब्राह्मण समाज की नाराजगी अनायास नहीं है। थोड़ा अतीत की ओर चलते हैं। सन 17 में जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और उसके बाद पहली कैबिनेट हुई तो भगवान परशुराम जयंती की छुट्टी रद्द कर दी गई। ब्राह्मणों को यह बात कोड़े की तरह सालने लगी। लेकिन सरकार में शामिल किसी ब्राह्मण विधायक ने इसका मुखर विरोध नहीं किया। उधर, इसके पहले समाजवादी पार्टी सरकार ने परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया था।

कुछ और लोमहर्षक घटनाएं। 26 जून 2017 को रायबरेली के ऊंचाहार के अपटा गांव में ब्राह्मण परिवार के पांच सदस्यों को जिंदा जला दिया गया। थोड़ा हो-हल्ला होने के बाद हुआ कुछ नहीं। इसी तरह 12 अक्टूबर 2019 को झांसी में पंडित जगदीश को उनके परिवार के चार सदस्यों सहित जिंदा जलाकर मार डाला गया। इसी तरह झांसी जिले में ही पिपरी बाजार के निकट एक ब्राह्मण परिवार के चार सदस्यों को रहस्यमय तरीके से मौत के मुंह में धकेल दिया गया। फतेहपुर जिले के शिक्षक बालकृष्ण तिवारी, बस्ती के आदित्य नारायण तिवारी की भी निर्मल हत्या कर दी गई। मैनपुरी के एक हॉस्टल में ब्राह्मण छात्रा की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। यह तो कुछ उदाहरण भर हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो सन 17 से लेकर अब तक ब्राह्मणों पर जुल्म की इंतेहा होती रही और इस समाज के रहनुमा जो सरकार में भी शामिल हैं, वह बेशर्मी के साथ जुबान बंद किए रहे।
इसी कड़ी में अगर अपराधियों के एनकाउंटर की बात की जाए तो उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के बाद सबसे ज्यादा एनकाउंटर ब्राह्मणों के हुए हैं। सरकार का कहना है कि अपराधियों की कोई जाति नहीं होती और यह सब जीरो टॉलरेंस नीति के तहत किया जा रहा है। बात बिल्कुल सही है, अपराधियों को मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। कोई भी जागरूक नागरिक अपराध अथवा अपराधियों के पक्ष में नहीं खड़ा होगा। लेकिन अगर जाति विशेष को टारगेट किया जाएगा तो निश्चित रूप से इस पर उंगलियां उठना लाज़मी है। कानपुर के बहुचर्चित बिकरू कांड के विकास दुबे का कथित एनकाउंटर हुआ और इसका कोई विरोध नहीं किया गया बल्कि सरकार की वाह- वाही की गई। लेकिन इसी के साथ प्रभात मिश्रा, अमर दुबे, अतुल दुबे और प्रेम प्रकाश को भी मौत के घाट उतार दिया गया। यही नहीं, अमर दुबे की विवाहिता खुशी दुबे को बिना किसी कुसूर के जेल में डाल दिया गया। हद तो तब हो गई जब जेल में कुख्यात मुकीम काला की हत्या हुई और उसी दरमियान इस जेल में बंद अंशु दीक्षित भी मारा गया। इसी तरह राजेश दुबे को गाजीपुर में, कमलेश तिवारी को लखनऊ में, दीपक शुक्ला को बस्ती में और प्रदीप पांडे को गोरखपुर में कथित एनकाउंटर में मार डाला गया। विनोद शर्मा, सोनू पंडित, नरेश पंडित भी एनकाउंटर में मार दिए गए। आपराधिक प्रवृत्ति के वकील पांडे भदोही को, विवेक पांडे प्रतापगढ़, सुशील दुबे आजमगढ़, अनुभव शुक्ला लखनऊ, विनोद उपाध्याय गोरखपुर, हेमंत शर्मा मथुरा समेत कई और आपराधिक प्रवृत्ति के बदमाशों को पुलिस ने कथित एनकाउंटर में ढेर कर दिया। आंकड़े गवाही देते हैं कि योगी सरकार में कुल 38 ब्राह्मण समाज के आपराधिक पृष्ठभूमि के बदमाशों को मौत के घाट उतारा गया। विपक्षी समाजवादी पार्टी का कहना है कि भाजपा सरकार में जाति विशेष को निशाना बनाया जा रहा है। ब्राह्मण समाज पर अत्याचार को लेकर सन 2020 में सुल्तानपुर जनपद के लंभुआ से भाजपा विधायक देवमणि द्विवेदी ने विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था। नतीजा हुआ कि 2022 के चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया। यही नहीं , लगातार उपेक्षा से आहत होकर राजधानी लखनऊ में ब्राह्मण समाज के करीब 50 विधायकों ने जो अन्य दलों में भी शामिल थे, उन्होंने मीटिंग की तो भाजपा की ओर से उन्हें हिदायत दी गई। जबकि इसके पहले ठाकुर विधायकों ने भी अपनी बिरादरी की मीटिंग की थी। ट्रांसफर पोस्टिंग में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर जातिवाद का आरोप लगाता रहा है। एक दिलचस्प तथ्य है कि भाजपा की हाल ही में जो कार्य समिति गठित की गई है, उसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी भी ब्राह्मण को शामिल नहीं किया गया है। सहारनपुर के रहने वाले और परशुराम सामाजिक संस्था के अध्यक्ष ब्राह्मण नेता विनोद शर्मा पर भी भाजपा सरकार में बहुत अत्याचार हुए। यहां तक कि उनके घर की कुर्की कर दी गई। लखीमपुर के विधायक निरवेंद मिश्र को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया गया था। लेकिन हुआ कुछ नहीं। इस हाल में ब्राह्मण समाज को अब अपनी उपेक्षा का एहसास हुआ है और उन्हें समाजवादी पार्टी की सरकार याद आ रही है। नेताजी मुलायम सिंह ने हमेशा माता प्रसाद पांडे को विधानसभा का अध्यक्ष बनाया, जब जब उनकी सरकार रही। पंडित जनेश्वर मिश्र को सपा ने इतना आदर दिया जो किसी से छुपा नहीं है। आज लखनऊ में एशिया का सबसे बड़ा पार्क पंडित जनेश्वर मिश्र के नाम पर है तो यह समाजवादी पार्टी की देन है। ब्राह्मणों के प्रति स्नेह और सम्मान में कोई कसर न रखने के एक नहीं समाजवादी पार्टी के पास सैकड़ो उदाहरण हैं। अवध क्षेत्र में अयोध्या के पवन पांडे हों या सुल्तानपुर के संतोष पांडे, इसके अलावा और ब्राह्मण नेता समाज के बीच जाकर जागरूकता फैला रहे हैं और ब्राह्मणों को सपा के पक्ष में लामबंद कर रहे हैं। हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व एमएलसी और ब्राह्मणों के प्रमुख चेहरा माने जाने वाले ओमप्रकाश त्रिपाठी ने ब्राह्मण समाज को लेकर एक बड़ा सम्मेलन करने का ऐलान कर दिया है।
यह भी बता दें कि अवध और पूर्वांचल में ठाकुर और ब्राह्मणों में 36 का आंकड़ा रहता है। ब्राह्मण समाज की बैठकों में यह बात बार-बार दोहराई जा रही है की अवध और पूर्वांचल में जाति विशेष के दबंगों का योगी सरकार में बाल बांका नहीं हो रहा है बल्कि उनको संरक्षण मिला हुआ है।
बस्ती, गोंडा, बहराइच, सुल्तानपुर, अयोध्या, प्रतापगढ़, जौनपुर, भदोही वाराणसी और कुछ अन्य जिलों में जाति विशेष के बाहुबलियों का सिक्का चल रहा है। उनके घर ना तो बुलडोजर चला और ना ही किसी अपराधी का एनकाउंटर हुआ। बहरहाल, बागपत से लेकर बलिया तक उपेक्षा से आहत ब्राह्मण समाज ने भाजपा के खिलाफ बिल्कुल फूंकने का मन बना लिया है। सपा और कांग्रेस गठबंधन इस सुनहरे अवसर को अपने हाथ से कतई नहीं जाने देना चाहती। वैसे भी ब्राह्मण समाज के अलावा भाजपा से पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग के लोग भी नाराज हैं। हाल ही में गोंडा में हुए साहनी हत्याकांड ने इस आग में घी का काम किया है। अखिलेश यादव के पीडीए में पिछड़ा वर्ग के साथ पंडित भी जुड़ जाएं तो अचरज नहीं होना चाहिए।




