उत्तर प्रदेश

वेस्ट यूपी की गुर्जर सियासत, तो अबके समझ-बूझ वन चरना हिरना….

अवनींद्र कमल
(राजनीतिक विश्लेषक)

उत्तर प्रदेश में सन 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गुर्जर समाज कैसा रुख अपनाता है, इसको लेकर प्रमुख सियासी दलों में ऊबचूभ तेज हो गई है। गंगा और यमुना के दोआब में तीन दर्जन से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां पर गुर्जर मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वेस्ट यूपी में भाजपा और रालोद की जुगलबंदी से खार खाई समाजवादी पार्टी हर संभव इसका काट ढूंढ रही है, ताकि 2027 में पनघट की डगर आसान हो सके। यही वजह है कि नोएडा और दादरी में सम्मेलन के बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव , सहारनपुर में रैली करने जा रहे थे लेकिन वहां के कुछ मुस्लिम नेताओं की चौधरी बंधुओं ( चौधरी रुद्र तथा इंद्र सेन) से नाराजगी की वजह से रैली स्थगित कर दी गई है।

अब राष्ट्रीय लोक दल के मुखिया जयंत चौधरी इस पर तंज कस रहे हैं तो समाजवादी पार्टी के नेता सफाई दे रहे हैं कि रैली तो होनी ही नहीं थी। बहरहाल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जरों के साथ अगर मुस्लिम मिलकर सपा का रुख करते हैं तो भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। ऐसा लक्षण दिखाई देने लगा है। और इस दशा में जयंत चौधरी को नुकसान झेलना पड़ सकता है। खैर, जहां तक गुर्जरों का सवाल है, इस समाज से बड़े-बड़े दिग्गज नेता हुए हैं। लेकिन , गुर्जर समाज को इस बात का मलाल है कि जाटों के बराबर उनकी संख्या होने के बवजूद भारतीय जनता पार्टी में वैसा वजूद नहीं है , जैसा वह चाहते हैं। हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव से ही गुर्जर समाज का अधिकांश वोट भारतीय जनता पार्टी की झोली में जाता रहा है।

बीजेपी को मिल रहा है एक मुश्त वोट

अगर अतीत में जाकर देखें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में भी गुर्जर समाज ने भाजपा को एकतरफा वोट किया था। गुर्जर मतदाताओं का रुख वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी नहीं बदला। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बिजनौर की बढ़ापुर सीट पर गुर्जरों ने सपा-रालोद गठबंधन के सजातीय प्रत्याशी कपिल गुर्जर को वोट न देकर भाजपा के ठाकुर प्रत्याशी सुशांत सिंह को जिताया।

नोएडा में भी गुर्जरों ने गठबंधन के सजातीय प्रत्याशी सुनील चौधरी को वोट न देकर भाजपा के पंकज सिंह को रिकॉर्ड मतों से जिताया। जेवर में गठबंधन के अवतार सिंह भड़ाना की जगह गुर्जरों ने भाजपा के ठाकुर प्रत्याशी धीरेंद्र सिंह को जिताया। इसी तरह मुजफ्फरनगर जनपद के खतौली में गठबंधन के करतार सिंह भड़ाना की जगह गुर्जर वोटर भाजपा के साथ चले गए। सहारनपुर के नकुड में भाजपा ने पहली बार गुर्जर चेहरे के तौर मुकेश चौधरी को उतारा और गठबंधन के कद्दावर नेता धर्मसिंह सैनी को यहां हार का सामना करना पड़ा। हापुड़ जिले की गढ़ सीट पर गठबंधन के गुर्जर प्रत्याशी रविंद्र की जगह गुर्जर वोटरों ने जाट नेता हरेंद्र को जिताया। हस्तिनापुर में भी भाजपा की जीत गुर्जरों ने तय की। अमरोहा के हसनपुर में भी इस समुदाय ने गठबंधन के मुखिया गुर्जर की जगह भाजपा के खड़गवंशी को चुना। सहारनपुर की रामपुर मनिहारन, बागपत, बडौत, गंगोह समेत गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर एवं आसपास की कई सीटों पर गुर्जर मतदाताओं का भाजपा के पक्ष में ही रुझान दिखा था।

भाजपा के अभियान की धुरी रहे गुर्जर

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में गुर्जर मतदाता एक बार फिर गंगा यमुना दोआब से घिरे पश्च‍िम यूपी में भाजपा के अभियान की धुरी बन गए । लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले पार्टी ने बिजनौर निवासी और प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री रहे अशोक कटारिया को विधान परिषद सदस्य निर्वाचित कराकर पश्च‍िमी यूपी में गुर्जर समाज को सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की थी। गुर्जर समाज के ही सुरेंद्र नागर भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं। कृष्णपाल गुर्जर केंद्र सरकार में मंत्री हैं। राजस्थान की अलका गुर्जर की भी भाजपा में एक हैसियत है। इन सारी बातों के बावजूद गुर्जर समाज में भाजपा को लेकर असंतोष है। पश्च‍िमी यूपी के गुर्जर नेताओं का कहना है कि हमारी जाट समुदाय के बराबर आबादी और इनसे ज्यादा मजबूती के साथ भाजपा का समर्थन करने के बावजूद उन्हें सरकार में हाशिए पर ही रखा गया है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पश्च‍िमी यूपी में भाजपा के 13 जाट उम्मीदवारों में से छह ,जबकि सात गुर्जर उम्मीदवारों में से पांच गुर्जर विधायक जीते थे। भाजपा ने गुर्जर समाज के किसी भी नेता को प्रदेश अध्यक्ष कभी नहीं बनाया।

सभी दलों में रही है गुर्जर लीडरशिप

हालांकि कि अलग-अलग दलों के पश्रिचिमी यूपी में गुर्जर नेताओं के प्रतिनिधित्व पर नजर डालें तो पता चलता है कि सहारनपुर लोकसभा सीट से गुर्जर उम्मीदवार चौधरी नकली सिंह भाजपा के टिकट पर तीन बार जीते हैं। रामचंद्र विकल कांग्रेस के बड़े गुर्जर नेता थे जो बागपत से सांसद चुने गए थे। इतिहास गवाही देता है कि गौतमबुद्ध नगर और मेरठ लोकसभा सीट से भी गुर्जर नेता चुनाव जीतकर सांसद बने हैं। गुर्जर बिरादरी के प्रदीप चौधरी 2019 के चुनाव में कैराना जैसी सीट से जीते थे। कंवर सिंह तंवर भी गुर्जर बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं और अमरोहा सीट को जीत चुके हैं।

एक बार फिर याद कीजिए कि पश्च‍िमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर आबादी जाट समुदाय के करीब करीब बराबर ही ठहरती है।पश्च‍िमी यूपी के 14 लोकसभा सीटों में प्रत्येक पर कम से कम 80 हजार गुर्जर समुदाय की आबादी है। इनमें भी सबसे ज्यादा ढाई लाख गुर्जर आबादी गौतमबुद्ध नगर में है। कैराना में करीब दो लाख गुर्जर हैं। सवा लाख के करीब गाजियाबाद लोकसभा सीट पर हैं। अभी की बात करें तो
उत्तर प्रदेश में कुल 8 गुर्जर विधायक हैं , जिनमें भाजपा के 5 विधायक हैं। तेजपाल नागर दादरी विधानसभा सीट, नंद किशोर गुर्जर लोनी विधानसभा सीट, मेरठ से सोमेंद्र तोमर, सरसावा से मुकेश चौधरी और गंगोह से विधायक किरत सिंह गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। बाकी तीन विधायक रालोद और सपा से हैं। गुर्जर समाज के नेता अशोक कटारिया, नरेंद्र भाटी और विरेंद्र सिंह यूपी विधान परिषद के सदस्य हैं। भाजपा के राज्यसभा सांसद सुरेंद्र नागर भी गुर्जर समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं। फिर भी गुर्जर समाज के नेता आबादी के अनुपात में अपनी बिरादरी को कम प्रतिनिधित्व मिलने का आरोप लगा रहे हैं। वह कहते हैं कि पूर्व में गुर्जर समाज के नेता रामचंद्र विकल और बाबू नारायण सिंह यूपी के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं।

अखिलेश यादव के अपने दावे और तर्क

सपा मुखिया अखिलेश यादव यह कहते नहीं थकते कि गुर्जर नेता चौधरी रामशरण दास मरते दम तक समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे। तमाम और उदाहरण देते हैं। इन बातों के बावजूद कैराना लोकसभा सीट से पिछले लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने और एमएलसी नहीं बनाने से नाराज चल रहे सहारनपुर के चौधरी बंधुओं (इंद्रसेन और रुद्रसेन) भी परेशानी का सबब बने हुए हैं। लोकसभा चुनाव के दरमियान चौधरी परिवार ने उपेक्षा से त्रस्त होकर पार्टी छोड़ने के संकेत दे दिए थे। इससे सपा में गुर्जर वोट खिसकने का खतरा बढ़ गया था। इन्हें मनाने के लिए सपा मुखिया अखिलेश यादव ने विशेष विमान भेजकर लखनऊ बुलाया था। लखनऊ में दोनों भाइयों के साथ अखिलेश यादव की वार्ता हुई। यहां मान-मनौव्वल कर दोनों की नराजगी दूर की गई।अब अखिलेश यादव की 6 सितंबर की रैली भले ही कैंसिल हो गई हो लेकिन चौधरी बंधु नाराज ना हों लिहाजा 2 सितंबर को ही सपा मुखिया अखिलेश यादव सहारनपुर उनके घर पहुंच रहे हैं।

बताया जाता है कि अखिलेश यादव की रैली को लेकर जो पोस्टर और होर्डिंग लगाए गए थे उसमें कैराना सांसद इकरा के फोटो तक नहीं थे। वहीं सपा विधायक आशु मलिक, विधायक उमर अली भी नाराज बताए जा रहे हैं। इस तरह सहारनपुर में गुर्जरों और मुसलमानों को एक साथ साधना समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। बेशक गुर्जर समाज भारतीय जनता पार्टी से नाराज बताया जा रहा है लेकिन सभी को सपा के पाले में करना आसान कतई नहीं है। हां, इतना जरूर रहा कि मुसलमान जयंत के साथ नहीं जा रहे। विकल्प के तौर पर समाजवादी पार्टी ही बच रही है। इसलिए अखिलेश यादव को सामाजिक और राजनीतिक समीकरण साधने के लिए बहुत सूझबूझ के साथ कदम रखना होगा। उनके लिए तो बस यही कहना होगा कि-अबके समझ- बूझ वन चरना हिरना। क्यों? क्योंकि भाजपा के शिकारी घात लगा कर बैठे हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button