उत्तर प्रदेश

कितना असर कर पाएगी जाट लैंड में जयंत की जादूगरी

अवनींद्र कमल

(राजनीतिक विश्लेषक)

रालोद मुखिया और केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत चौधरी की जादूगरी जाटलैंड में चल पाएगी, इसमें संशय है। कुछ समय पहले अपने राजनैतिक सखा अखिलेश यादव को गच्चा देकर भारतीय जनता पार्टी में समा जाने वाले जयंत को मंत्री पद जरूर मिल गया, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का एक बड़ा वोट बैंक उनके हाथ से निकल चुका है। जयंत चौधरी भाजपा के बगलगीर भले हो गए हैं, लेकिन उनकी स्थिति सर्कस के शेर जैसी हो गई है। देखा गया है कि भारतीय जनता पार्टी अपने सियासी पिंजरे में जिसको भी कैद करती है, उसके नाखून पहले ही काट देती है। इस संदर्भ में अगर सन 2027 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की बात करें तो लगता नहीं कि भाजपा के साथ रालोद की जुगलबंदी कोई खास गुल खिला पाएगी। बेशक, 3 सितंबर को सहारनपुर जनपद के रामपुर मनिहारान स्थित गोचर महाविद्यालय में स्वाभिमान रैली को बतौर मुख्य अतिथि जयंत चौधरी संबोधित करने आ रहे हैं और बिजनौर के सांसद संजय चौहान पूरी लश्कर के साथ रैली को सफल बनाने की ठान लिये हैं, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे, यह समय बताएगा। सच्चाई तो यह है कि स्वाभिमान रैली एक तरह का शक्ति प्रदर्शन है। पश्चिमी उतर प्रदेश में गुर्जर समाज भारतीय जनता पार्टी को लेकर बहुत संतुष्ट नहीं है। समाज के जिम्मेदार लोगों का कहना है कि योगी सरकार में गुर्जर समाज का एक भी फुल कैबिनेट मंत्री नहीं है। जबकि गुर्जरों की आबादी जाटों से कम नहीं । उधर, जाट समाज का एक बड़ा तपका भाजपा से रुष्ट बताया जाता है। स्वर्गीय सतपाल मलिक के साथ भारतीय जनता पार्टी ने जैसा व्यवहार किया, जाट समाज उसको भूला नहीं है। यही नहीं युवाओं में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत आक्रोश है। बेरोजगारी, महंगाई और भाजपा के झूठ प्रपंच के आगे समाज के सभी वर्ग के युवा नाखुश हैं। विधायकों के कथित भ्रष्टाचार और जनता जनार्दन से दूरी ने पेट्रोल में आग की तरह काम किया है। किसानों की कमर टूट गई है, जबकि धन्ना सेठों के हजारों करोड़ के कर्ज माफ किए जा रहे हैं।

अगर इन बातों को छोड़ भी दें तो जातीय समीकरण की जहां तक बात है, उसमें भी रालोद पूरी तरह फिट बैठता नहीं दिखाई पड़ रहा है। सपा के साथ रहकर जयंत की दाल विधानसभा चुनाव में गल गई थी और 2022 के चुनाव में रालोद के आठ विधायक चुन लिए गए थे। 27 के चुनाव में जयंत चौधरी को नाको चने चबाने पड़ सकते हैं।

जरा याद कीजिए, सन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद रालोद का क्या हश्र हुआ था। एक वक्त ऐसा आया, जब जयंत चौधरी और उनके पिता अजित चौधरी दोनों लोकसभा का चुनाव हार गए।

जाट समाज को यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा, राष्ट्रीय लोक दल को मियादी बुखार में रोटी के टुकड़े जितना ही खुराक देगी। यह बात जयंत चौधरी को भी पता होगी। लेकिन राजनीति में अवसरवाद और धोखेबाजी कोई नई बात नहीं है। जयंत ने अखिलेश का साथ छोड़कर अगर भाजपा का दामन थाम लिया, तो उन्होंने एक तरह से सपा से बदला ही लिया है। सियासत के जानकारों को पता होगा कि मुलायम सिंह 89 में पहली बार जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तो जयंत चौधरी के पिता अजित सिंह को पटखनी दे दी थी। तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, अजित सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे।

उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी थी। मुलायम सिंह यादव को बीपी सिंह उपमुख्यमंत्री बना रहे थे। लेकिन मुलायम को मंजूर नहीं था। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को मुलायम सिंह पसंद थे। चंद्रशेखर चाहते थे कि मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बनें। इस दशा में बीपी सिंह ने तब के नेता मधु दंडवते समय तीन नेताओं को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा।आखिरकार गुप्त मतदान हुआ और मुलायम सिंह यादव ने तब के बाहुबली और माफिया डॉन डीपी यादव के सहयोग से 11 विधायकों को अपने पक्ष में कर लिया। गुप्त मतदान जब हुआ तो परिणाम आया और अजित सिंह पांच वोटों से पीछे रह गए। जबकि मुलायम सिंह यादव, चौधरी अजित सिंह के पिता पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक कक्षा के सबसे मेधावी विद्यार्थी थे। लेकिन उन्हीं के बेटे चौधरी अजित सिंह को मुलायम सिंह ने गच्चा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में अखिलेश यादव का चवन्नी से रुपया बना देने वाला बयान जाटों को अखरना स्वाभाविक है।

उल्लेखनीय है कि 3 सितंबर को रामपुर मनिहारान की रैली में मंच से यह सब बातें जरूर छिड़ेंगी, लेकिन विधानसभा चुनाव पर इसका कितना असर होगा, यह देखने लायक होगा। सपा की तुलना में राष्ट्रीय लोकदल का कद केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। समाजवादी पार्टी का फैलाव बागपत से लेकर बलिया तक है। जाट समाज समाजवादी पार्टी को भले ही कम संख्या में वोट करे लेकिन गुर्जर बिरादरी में सपा के कई सूरमा हैं। गुर्जर समाज के चौधरी राम शरण दास को समाजवादी पार्टी ने मरते दम तक प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी जिलों में गुर्जर बिरादरी के धुरंधर नेता हैं। ऐसे में मलूक नागर, चंदन चौहान जैसे गुर्जर नेता कितनी भी कसरत कर लें लेकिन सपा का पिलर कमजोर करने में उनके पसीने छूट सकते हैं।

वैसे भी भारतीय जनता पार्टी के सर्वे में स्थिति कमजोर बताई जाती है। चंदा चोरी प्रकरण ने भाजपा के कथित हिंदुत्व की पोल पट्टी खोल दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार नेमतों की बौछार कर रहे हैं। भाजपा की आंतरिक कलह भी उसको नुकसान पहुंचा रही है। इसका असर रालोद पर पड़े बिना नहीं रहेगा। जानकारों का कहना है कि भाजपा रालोद को 10 से अधिक सीट नहीं देने वाली। फिलहाल, राष्ट्रीय लोक दल वह पंछी है, जिसकी उड़ान भाजपा की मर्जी पर निर्भर है, मनमर्जी पर कतई नहीं। चुनाव तक भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय लोग दल में सीटों को लेकर टकराव से इनकार नहीं किया जा सकता। अखिलेश यादव के पीडीए की काट करने को लेकर भाजपा

बेचैन है। अवध और पूर्वांचल का ब्राह्मण समाज भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार बैठा है।

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